Thursday 18 June 2009

अँधेरा हो गया, चलो चलते हैं

"तबियत कैसी है अब?"

"ठीक है अब तो....आज ऑफिस आया न...फीलिंग बेटर"

"हाँ ऑफिस भी तो तुम्हें घर जैसा ही लगता है"

"घर से बेहतर कहो, वहाँ तो धुल भरी आंधियां चला करतीं हैं......किसी तरह रात को सुबह करता हूँ"

"और ऑफिस?"

"यहाँ आंधी नहीं चलती, या यूँ कहूँ कि आंधी भी शर्माती है, प्रोफेशनल्स के बीच आने में........इसी का फ़ायदा उठाता हूँ १२ १५ घंटे पहले बिताये न बीतते थे.......अब सुकून मिलता है"

"आंधी और ऑफिस.......पुराना रिश्ता है..........देखते देखते दोस्त, शहर, बाजार सब उड़ा ले जाती है यह"

"क्या दोष देना, पैर ठीक से टिके ही नहीं कभी............"

"सब अचानक हुआ न?"

"हाँ पता ही नहीं चला चलते चलते इतने दूर आ गए..........कभी थकावट भी महसूस नहीं हुई"

"सबसे बहाने किये, मिन्नतें कीं, बताओ मैं कहाँ हूँ........काश तुम ही पुकार लेते....."

"छोडो जाने दो, सामने ढलते सूरज को देखो, रोज का इसका यही काम है"

"तुम्हें याद है लास्ट टाइम हम यहाँ कब आये थे? ढेर सारा सामान था अपने पास......."

"हाँ, शौपिंग कर यहाँ आकर बैठे थे, कॉर्नर की बेकरी पर चाय पी थी.............."

"सारा सामान घर पर अभी भी पड़ा है न....."

"और तुमने आइसक्रीम ली थी"

"बोलो ना.......वो कांच के बर्तन का सेट....वो टुटा नहीं ना?"

"तुम्हारे साथ ली गयी एक एक चीज सहेजकर रखी मैंने, बस तुम..........................”

सामने डूबते सूरज ने उसे और कुछ कहने न दिया.......शाम के धुंधलके में इस टीले से शहर की टिमटिमाती रौशनी देखा किया वह थोडी देर की चुप्पी और फिर कुछ सिसकियाँ.......अपनी मजबूरियों, बेचारगी पर इतना अफ़सोस कभी नहीं हुआ उसे..........

"अँधेरा हो गया, चलो चलते हैं"


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Sunday 14 June 2009

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

"४ साल से साथ में हैं दिल्ली में, साउथ इंडिया में मन नहीं लगेगा|कुछ भी करके यहीं रुक जाओ प्लीज़"

"क्या करें करियर भी तो जरुरी है न"

"ह्म्म्म्म, हम कभी रहे नहीं उधर, पता नहीं कैसे एडजस्ट करेंगे"

"आप रहिये यहीं, २ साल की तो बात है"

एक नजर उसकी और देखा| क्या रह सकती हो मेरे बिना| तुम्हारी छोडो, क्या मैं रह सकता हूँ| क्या करना है, कहाँ जाना है, सब पर तो पहले मुझसे हाँ कराती हो|

"जॉब ही है, कहीं करें, दिल्ली या साउथ इंडिया, क्या फर्क पड़ता है, २ साल की तो बात है!"
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कल दोपहर ही उसका मेसेज आया था| "हैदराबाद में जॉब मिली है, शनिवार शाम को जाना है|"

वैसे अलग हुए तो ३ महीने बीत गए, लेकिन आज की इस खबर से मन कुछ उदास सा है| एक टूटन सी है| भले ही दिन काट रहा बंगलौर में, एक सुकून जरूर था कि वो भी यहीं है| क्या पता सामने से आती दिखाई दे जाए| क्या पता अभी दरवाजे पर दस्तक हो| एक मेसेज ही आ जाए| कम से कम उसकी सहेली ही उसका हाल बता जाए|

आज मेसेज आया| "आज शाम की बस है, हो सके तो एक बार मिल लीजिये|"

किसी से मिलने में इतना डर पहले कभी लगा नहीं मुझे| मिला, शुभकामनाएं दीं, हाल चाल पूछा, बताया|

अलग होते समय उसकी आँखों में नमी ढूंढ़ रहा था मैं, लेकिन उसने मेरी और देखा ही नहीं| मेरे तो लफ़्ज भी भरभरा रहे थे, कमबख्त तड़प जुबान को भी नहीं छोड़ती| अभी २ मिनट में बस आ जायेगी| कुछ कह लूँ, फिर शायद कभी न मिलें|

"अपना ख्याल रखना"

"हाँ"

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Sunday 1 February 2009

अब दिल कहीं और लगाया न जाएगा

अब दिल कहीं और लगाया न जाएगा,  
लगायें भी तो वो ताव लाया न जाएगा|  

माजी के दिए दर्द बताऊँ कभी नहीं,  
पूछोगे गर तो मुझसे छुपाया न जाएगा|  

मुस्कुराकर तुम्हें आज बिदा करूँ मगर,  
खता माफ़ मुझसे हाथ हिलाया न जाएगा|  

चेहरा न देखने की कसम दिला तो दी,  
ख्यालों से उस शख्स का साया न जाएगा|  

बेबस ये दिल मेरा कुछ इस कदर समझा, 
अब और किसी से ये समझाया न जाएगा|  

मुझको भुला दिया उसने मगर खुदा,  
मुझसे तो महबूब भुलाया न जाएगा|  

वास्ता 'जमाल' का नींद से कब मगर,  
सो जाए फिर किसी से जगाया न जाएगा|

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Wednesday 28 January 2009

प्यार को प्यार ही रहने दो...

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो| नाम न दो क्यूंकि नाम दोगे तो यहाँ भी कारोबार शुरू हो जायेगा|














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Tuesday 20 January 2009

भारत का सबसे पुराना मन्दिर

बिहार के भभुआ (कैमूर) जिले के माँ मुंडेश्वरी मन्दिर को भारत का सबसे पुराना मन्दिर माना जाता है| एएसआई (आकिर्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) ने भी माना है कि इतिहास के मद्देनजर यह देश का सबसे पुराना मंदिर है।

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यह मंदिर 608 फीट ऊंची कैमूर पहाड़ी पर है। मंदिर के आसपास पाए गए शिलालेखों और सरकारी रेकॉर्ड के हवाले से बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड के प्रशासक आचार्य किशोर कुणाल बताते हैं कि मंदिर 108 ईस्वी में बनाया गया। माना जाता है कि इसे शक शासनकाल में बनाया गया। यह शासनकाल गुप्त शासनकाल (302 ईस्वी) से पहले का है। दो टुकड़ों में पाए गए एक शिलालेख पर ब्राह्मी लिपि अंकित है। जबकि गुप्त शासनकाल में पाणिनी के प्रभाव के कारण विशुद्ध संस्कृत का उपयोग किया जाता था। वैसे, यह मंदिर और पुराना भी हो सकता है, एएसआई और इतिहासकारों द्वारा शोध कार्य जारी है| 

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यहां पिछले 1900 सालों से आज तक पूजा हो रही है। यहां का अष्टाकार गर्भगृह तब से अब तक कायम है। गर्भगृह के कोने में देवी की मूर्ति है, जबकि बीच में अष्टधातु का चतुर्मुखी शिवलिंग हैं। मुंडेश्वरी देवी कौन हैं इसपर लोग एकमत नहीं है क्यूंकि इस रूप की देवी को कहीं और नहीं देखा गया| अष्टधातु का चतुर्मुखी शिवलिंग भी अपने आप में अनूठा है| पहाड़ी पर स्थित मन्दिर तक जाने के रास्ते के दोनों तरफ़ गणेश, शिव, पत्थर की अन्य कलाकृतियाँ बिखरी पड़ी मिलती हैं|

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कुछ साल पहले बीएचयू के इतिहासकार आई. एस. रॉय ने मंदिर के पास खेतों से गुजरते हुए सीलोन (आज का श्रीलंका) की मुद्रा पाई थी। इस पर ब्राह्मी लिपि में कुछ अंकित था। राय ने 2004 में इसका जिक्र न्यूमिजमैटिक सोसाइटी ऑफ इंडिया की पत्रिका में लिखे लेख में किया। सीलोन के तीर्थयात्रियों के लिए यह मुद्रा पासपोर्ट का काम करती थी। भारत में विभिन्न राजवंशों के शासन क्षेत्र में आने वाले बौद्ध स्थलों तक उन तीर्थ यात्रियों का सुरक्षित पहुंचना मुमकिन हो पाता था। सीलोन के राजा महाराज दत्तागमानी ने मुंडेश्वरी की पहाडि़यों पर स्तूप बनवाया था। जानकार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और नेपाल के कपिलवस्तु का रास्ता मुंडेश्वरी मंदिर से जुड़ा था।

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1900 वर्ष पूर्व मां मुंडेश्वरी धाम में चावल (तांडुल) का भोग लगता था और प्रसाद स्वरूप यही तांडुल भक्तों को वितरित किया जाता था। राजा द्वारा मुंडेश्वरी धाम में भोग लगाने के लिए 50 से 500 स्वर्णदिनार (सिक्के) दिये जाते थे। जिसके माध्यम से चावल, पुष्प व अन्य प्रसाद प्रतिदिन चढ़ाया जाता था। स्वर्णदिनार की अमेरिका में नीलामी हो रही है जिसे महावीर मंदिर, पटना द्वारा भारत मंगाने की प्रक्रिया चल रही है।


बिहार सरकार द्वारा रोपवे की व्यवस्था शीघ्र की जायेगी| मन्दिर के आसपास बिखरी मूर्तियों के लिए संग्रहालय बनाया जा चुका है|


भभुआ बनारस से 60 किलोमीटर और गया से 150 किलोमीटर की दुरी पर है और जीटी रोड से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है| अगर रेल से जाना चाहें तो बनारस, मुगलसराय, सासाराम, गया से मोहनियां स्टेशन (भभुआ रोड) (मुगलसराय-गया लाइन पर)  आ सकते हैं, वहाँ से मन्दिर तक के लिए वाहन हमेशा उपलब्ध होते हैं|


रोचक बात यह है कि मन्दिर की देख रेख सालों से एक मुस्लिम परिवार करता आया है जिसे जनता भी सहर्ष स्वीकार करती है|

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