अँधेरा हो गया, चलो चलते हैं
"तबियत कैसी है अब?"
"ठीक है अब तो....आज ऑफिस आया न...फीलिंग बेटर"
"हाँ ऑफिस भी तो तुम्हें घर जैसा ही लगता है"
"घर से बेहतर कहो, वहाँ तो धुल भरी आंधियां चला करतीं हैं......किसी तरह रात को सुबह करता हूँ"
"और ऑफिस?"
"यहाँ आंधी नहीं चलती, या यूँ कहूँ कि आंधी भी शर्माती है, प्रोफेशनल्स के बीच आने में........इसी का फ़ायदा उठाता हूँ १२ १५ घंटे पहले बिताये न बीतते थे.......अब सुकून मिलता है"
"आंधी और ऑफिस.......पुराना रिश्ता है..........देखते देखते दोस्त, शहर, बाजार सब उड़ा ले जाती है यह"
"क्या दोष देना, पैर ठीक से टिके ही नहीं कभी............"
"सब अचानक हुआ न?"
"हाँ पता ही नहीं चला चलते चलते इतने दूर आ गए..........कभी थकावट भी महसूस नहीं हुई"
"सबसे बहाने किये, मिन्नतें कीं, बताओ मैं कहाँ हूँ........काश तुम ही पुकार लेते....."
"छोडो जाने दो, सामने ढलते सूरज को देखो, रोज का इसका यही काम है"
"तुम्हें याद है लास्ट टाइम हम यहाँ कब आये थे? ढेर सारा सामान था अपने पास......."
"हाँ, शौपिंग कर यहाँ आकर बैठे थे, कॉर्नर की बेकरी पर चाय पी थी.............."
"सारा सामान घर पर अभी भी पड़ा है न....."
"और तुमने आइसक्रीम ली थी"
"बोलो ना.......वो कांच के बर्तन का सेट....वो टुटा नहीं ना?"
"तुम्हारे साथ ली गयी एक एक चीज सहेजकर रखी मैंने, बस तुम..........................”
सामने डूबते सूरज ने उसे और कुछ कहने न दिया.......शाम के धुंधलके में इस टीले से शहर की टिमटिमाती रौशनी देखा किया वह थोडी देर की चुप्पी और फिर कुछ सिसकियाँ.......अपनी मजबूरियों, बेचारगी पर इतना अफ़सोस कभी नहीं हुआ उसे..........
"अँधेरा हो गया, चलो चलते हैं"


















