Friday 28 November 2008

उसकी हर बात पे....


रात का चाँद रुला जाता है मुझे,
उनसे दूरी को बताकर सताता है मुझे।

जी करे नोच दूँ तेरी चमक पर अभी,
उस परी नाजुक का ख़्याल आता है मुझे।

तुझे किस बात की रौउनत है की तू,
उन क़दमों की धूल नजर आता है मुझे।

मुझसे एक बार भी न मिलने वाला,
हर पल जिंदगी से मिलाता है मुझे।

जख्म की राह से जो मैं कभी गुजरा,
गुलों की याद फिर दिलाता है मुझे।

जो सिखाता रहा हंसने की अदा,
कुछ दिनों से अब रुलाता है मुझे।

उनको मुझपर यकीन नहीं है तो अब,
खुदपर यकीन नहीं आता है मुझे।

अब यकीन उनको दिला दे  खुदा,
जिनकी बातों पे यकीन आता है मुझे।

क्या कहा उनको नहीं अब भी यकीन ?
तू खुदा है यकीं नहीं आता है मुझे।

नहीं कहता तुझे खुदा भी मैंमगर,
उनके गुस्से का असर डराता है मुझे।

1 comment:

Hindustani said...

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