Monday 1 December 2008

शाम


दर्द-ऐ-दिल रोज बढाती रही है शाम, 
नई तड़प के साथ मिलाती रही है शाम ।

दो जहाँ के आंसूं आंखों में लिए हुए, 

पास आके हर घड़ी मुस्कुराती रही है शाम ।

कुछ इस अदा से दूर जाते रहें हैं आप, 
कुछ इस तरह से पास आती रही है शाम ।

समझो या न समझो लग्जिश ये जुबान की,
हर खूबी आपकी पर बताती रही है शाम ।

पहने हुए हैं आपके ख्यालों के पैराहन,
हर शाम आपसे ही मिलाती रही है शाम 

ऐतराफ़-ऐ-मोहब्बत वो करें या न करें, 

ऐतमाद-ऐ-मोहब्बत दिलाती रही है शाम । 

खिलवत के अंधेरे हों या जलवत के उजाले, 

आवाज बस आपकी ही सुनाती रही है शाम ।

उनको हुआ नहीं कभी हमपे ऐतबार, 

ये यकीं हमको दिलाती रही है शाम ।

मिले जब कभी भी किसी हसीं से हम,

तस्वीर आपकी ही दिखाती रही है शाम ।

जिंदगी की आदत कुछ यूँ पड़ी 'शेखर',

जीने के फलसफे सिखाती रही है शाम ।

1 comment:

Basant Lal "Chaman" said...

her sham maykhane ko salam karta hu : jab talak na aate tera kalam yad karta hu ...........
besak bahut khub gazal.