Wednesday 10 December 2008

जिंदगी

_seesaw


पढ़ना जो चाहो तो है किताब जिंदगी,


है सवाल जिंदगी और जवाब जिंदगी|

 



गम भी साथ इसके चली आती है,


चांदनी को लिए माहताब जिंदगी|


 


इतने दिन मैं जिया क्या किया क्यूँ किया,


हर घड़ी मांगती है हिसाब जिंदगी|


 


जुस्तजू जिसकी थी वो हमें ना मिला,


जो मिला वो गया वाह वाह जिंदगी|



 

अब कहूँ ना कहूँ मानता मैं भी हूँ,


गर जियूं तो कहूँ लाजवाब जिंदगी|


 


कहता हूँ मैं 'जमाल' बात तुम मान लो,


आज तो ना कहो है ख़राब जिंदगी|

3 comments:

MANVINDER BHIMBER said...

अब कहूँ ना कहूँ मानता मैं भी हूँ,

गर जियूं तो कहूँ लाजवाब जिंदगी|

bahut sanjojan hai

परमजीत बाली said...

बढ़िया रचना है।बधाई।

रश्मि प्रभा said...

aapke aane se aap tak aayi aur zindagi ki gahraaiyon me doob gai,bahut achha likhte hain........