Thursday 11 December 2008

इस कदर

इस कदर शामिल है मुझमें शहर की वीरानियाँ, 


रगबत हुई है गाँव की रंगीनियों से अब|  



उस आवाज की कशिश को दिल में किया है जबसे, 


बुलंद हो चले हैं हर बुलंदियों से अब|

2 comments:

"अर्श" said...

बहोत खूब लिखा है आपने भाई ... ढेरो बधाई आपको...

seema gupta said...

"its beautiful composition"

regards