Wednesday 10 December 2008

रात

Night-1


वीरान अंधेरे में सिसकती मिली है रात,


हर रात रोज मुझको तड़पती मिली है रात|


 


जब कोई कोशिश हुई बिस्तर पे रात के,


चोट पर डरती सहमती मिली है रात|

 



होंठों को छूकर बढ़ गई इन होठों की जलन,


तकदीर चूमते ही बिखरती मिली है रात|

 



आंखों ने दूरियों को कुछ इस तरह देखा|


आकर करीब मेरे मचलती मिली है रात|

 



'शेखर' तेरी किस्मत में ना रात और ना दिन,


दिन डूबते ही दूर सरकती मिली है रात|

5 comments:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

सी ऐ वह भी शायर और इतनी खुबसूरत गजले ..... कमाल है

विनय said...

bahut sundar

ashish said...

kya baat hai mazaa aa gaya.wah wah wah wah

bhoothnath said...

maine kabhi isee par isi bahar men aisi hi kavita likhi thi(gazal kahane kaa saahas nahin...kyunki ham gazal kahanaa hi nahin jaante...!!)vo bhi dekhen....vaise aapki"....." bhi acchi hai naa..!!

प्यार से गले लगाया जब सिसकती मिली रात....
पास जब उसके गया तब सिमटती मिली रात...!!
रात जब आँखे खुलीं उफ़ तनहा-सी बैठी थी रात...
साँस से जब साँसे मिलीं तो लिपटती मिली रात !!
मैं दिखाता उसे नूर-ऐ-सबा सौगाते-सुबह की झलक
सुबह से पहले ही मगर सो गई वो चमचमाती रात
रात जब रात का मन ना लगा तब यूँ "गाफिल"
की पेट में गुदगुदी तो हंसने लगी मदमदाती रात !!
रात को जब कायनात भी थक-थकाकर सो गई
रात भर भागती फिरी बावली जगमगाती रात !!
रात को इक कोने में मुझको गमगीं-सा पाकर
सकपकाकर रोने लगी यकायक कसमसाती रात !!
रात जब रात का मन ना लगा तब यूँ "गाफिल"
की पेट में गुदगुदी तो हंसने लगी मदमदाती रात !!

vandana said...

rat ki tadap ka bahut achcha chitran kiya hai aapne