Monday 8 December 2008

सादगी

करते थे मोहब्बत और छुपाते रहे सबसे, 
बस ऐसे ही जमाने में मशहूर हो गए|  

ता उम्र जिन ग़मों से भागते फिरे थे हम, 
वो आज किसलिए हमें मंजूर हो गए|  

इजहार-ऐ-मोहब्बत पे बेकसी बयान की, 
कुछ और भी प्यारे आज हुजूर हो गए|  

है सादगी दिल की इसे खता नहीं कहना, 
मनाने की कोशिशों में ये कुसूर हो गए|  

आंसूं भी जिन ग़मों को सौंपा नहीं हमने, 
वो आज घुटते घुटते नासूर हो गए|  

शीशा जो चुभा वो उन्हीं आइनों का था, 
देख हुस्न आपका जो चूर चूर हो गए|  

मजबूरियाँ अपनी बतायीं जो यार ने, 
हमने कहा आह हम मजबूर हो गए|  

उसने भी आज दूर बनाया है आशियाँ, 
जिसके लिए 'जमाल' सबसे दूर हो गए|

3 comments:

poemsnpuja said...

इजहार-ऐ-मोहब्बत पे बेकसी बयान की,
कुछ और भी प्यारे आज हुजूर हो गए|


है सादगी दिल की इसे खता नहीं कहना,
मनाने की कोशिशों में ये कुसूर हो गए|

waah!!ye do sher to kasam se dil le gaye hamara. behtarin gazal. aaj pahli baar apke blog par aayi, aap kamaal ka likhte hain. ab kisi din fursat me saari gazlein padhne aaungi. ummid hai aap aise hi likhte rahenge. meri bahut bahut shubhkaamnayein.

Shashwat Shekhar said...

Taarif k liye shukriya. :)

रचना गौड़ ’भारती’ said...

आपने बहुत अच्छा लिखा है ।
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
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