Tuesday 6 January 2009

हँसता था तेरा दोस्त मगर पिछली रात को

कल रात को किया वो इन्तेजार कैसे,
मर मर के जी लिया तू बार बार कैसे|

देखो तो सही गैर की जानिब है वो नजर,
पूछो नहीं उठते हैं दिल में शरार कैसे|

इब्तिदा-ऐ-इश्क भी आफियत की है दुश्मन,
पूछते हैं वो नजर हुई यूँ आर पार कैसे|

देखूं तो मलामत है न देखूं तो शिकायत,
इन हुस्नवालों के भी हैं रोजगार कैसे|

हँसता था तेरा दोस्त मगर पिछली रात को,
फिर रोता रहा 'जमाल' तू जार जार कैसे|

12 comments:

poemsnpuja said...

हम तो पहले शेर पर ही निसार हो गए, कमाल का लिखा है...आफरीन आफरीन
कल रात को किया वो इन्तेजार कैसे,
मर मर के जी लिया तू बार बार कैसे|

शाश्‍वत शेखर ’जमाल’ said...

शुक्रिया। :)

mehek said...

देखूं तो मलामत है न देखूं तो शिकायत,
इन हुस्नवालों के भी हैं रोजगार कैसे|
waah ji wah bahut khub husnwalo ka rojgaar,behad khubsurat gazal,har sher pe daad hai hamaro.

रश्मि प्रभा said...

रात जब आती है तो दिल के देवाज़े खुलते हैं
और बेजार रोता है कोई..
बहुत बढिया

विनय said...

देखो तो सही गैर की जानिब है वो नजर,
पूछो नहीं उठते हैं दिल में शरार कैसे|

यार क़ातिल हो!

---मेरा पृष्ठ
चाँद, बादल और शाम

rewa said...

इब्तिदा-ऐ-इश्क भी आफियत की है दुश्मन,
पूछते हैं वो नजर हुई यूँ आर पार कैसे|


Wah wah...bahut khub. Bahut achha likha hai aapne.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

बहुत सुंदर ग़ज़ल , बेहतरीन

दिगम्बर नासवा said...

देखो तो सही गैर की जानिब है वो नजर,
पूछो नहीं उठते हैं दिल में शरार कैसे|

दम दार ग़ज़ल..........खास कर ये शेर

Vijay Kumar Sappatti said...

kya behtareen gazal likhi hai ji ..

bahut sundar bhaavnayen ...


badhai ..


vijay
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SANJEEV MISHRA said...

देखूं तो मलामत है न देखूं तो शिकायत,
इन हुस्नवालों के भी हैं रोजगार कैसे|

bahut khoob.Kya kaante ki baat likhi aapne.

अक्षय-मन said...

देखूं तो मलामत है न देखूं तो शिकायत,
इन हुस्नवालों के भी हैं रोजगार कैसे|

क्या कहूं अल्फाज़ नही हैं मेरे चहरे की हँसी महसूस करलो भाई....
दिल को बहुत खुशी होती है ऐसा पढने को बहुत कम मिलता है.....

jacker said...

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