Tuesday 20 January 2009

भारत का सबसे पुराना मन्दिर

बिहार के भभुआ (कैमूर) जिले के माँ मुंडेश्वरी मन्दिर को भारत का सबसे पुराना मन्दिर माना जाता है| एएसआई (आकिर्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) ने भी माना है कि इतिहास के मद्देनजर यह देश का सबसे पुराना मंदिर है।

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यह मंदिर 608 फीट ऊंची कैमूर पहाड़ी पर है। मंदिर के आसपास पाए गए शिलालेखों और सरकारी रेकॉर्ड के हवाले से बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड के प्रशासक आचार्य किशोर कुणाल बताते हैं कि मंदिर 108 ईस्वी में बनाया गया। माना जाता है कि इसे शक शासनकाल में बनाया गया। यह शासनकाल गुप्त शासनकाल (302 ईस्वी) से पहले का है। दो टुकड़ों में पाए गए एक शिलालेख पर ब्राह्मी लिपि अंकित है। जबकि गुप्त शासनकाल में पाणिनी के प्रभाव के कारण विशुद्ध संस्कृत का उपयोग किया जाता था। वैसे, यह मंदिर और पुराना भी हो सकता है, एएसआई और इतिहासकारों द्वारा शोध कार्य जारी है| 

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यहां पिछले 1900 सालों से आज तक पूजा हो रही है। यहां का अष्टाकार गर्भगृह तब से अब तक कायम है। गर्भगृह के कोने में देवी की मूर्ति है, जबकि बीच में अष्टधातु का चतुर्मुखी शिवलिंग हैं। मुंडेश्वरी देवी कौन हैं इसपर लोग एकमत नहीं है क्यूंकि इस रूप की देवी को कहीं और नहीं देखा गया| अष्टधातु का चतुर्मुखी शिवलिंग भी अपने आप में अनूठा है| पहाड़ी पर स्थित मन्दिर तक जाने के रास्ते के दोनों तरफ़ गणेश, शिव, पत्थर की अन्य कलाकृतियाँ बिखरी पड़ी मिलती हैं|

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कुछ साल पहले बीएचयू के इतिहासकार आई. एस. रॉय ने मंदिर के पास खेतों से गुजरते हुए सीलोन (आज का श्रीलंका) की मुद्रा पाई थी। इस पर ब्राह्मी लिपि में कुछ अंकित था। राय ने 2004 में इसका जिक्र न्यूमिजमैटिक सोसाइटी ऑफ इंडिया की पत्रिका में लिखे लेख में किया। सीलोन के तीर्थयात्रियों के लिए यह मुद्रा पासपोर्ट का काम करती थी। भारत में विभिन्न राजवंशों के शासन क्षेत्र में आने वाले बौद्ध स्थलों तक उन तीर्थ यात्रियों का सुरक्षित पहुंचना मुमकिन हो पाता था। सीलोन के राजा महाराज दत्तागमानी ने मुंडेश्वरी की पहाडि़यों पर स्तूप बनवाया था। जानकार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और नेपाल के कपिलवस्तु का रास्ता मुंडेश्वरी मंदिर से जुड़ा था।

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1900 वर्ष पूर्व मां मुंडेश्वरी धाम में चावल (तांडुल) का भोग लगता था और प्रसाद स्वरूप यही तांडुल भक्तों को वितरित किया जाता था। राजा द्वारा मुंडेश्वरी धाम में भोग लगाने के लिए 50 से 500 स्वर्णदिनार (सिक्के) दिये जाते थे। जिसके माध्यम से चावल, पुष्प व अन्य प्रसाद प्रतिदिन चढ़ाया जाता था। स्वर्णदिनार की अमेरिका में नीलामी हो रही है जिसे महावीर मंदिर, पटना द्वारा भारत मंगाने की प्रक्रिया चल रही है।


बिहार सरकार द्वारा रोपवे की व्यवस्था शीघ्र की जायेगी| मन्दिर के आसपास बिखरी मूर्तियों के लिए संग्रहालय बनाया जा चुका है|


भभुआ बनारस से 60 किलोमीटर और गया से 150 किलोमीटर की दुरी पर है और जीटी रोड से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है| अगर रेल से जाना चाहें तो बनारस, मुगलसराय, सासाराम, गया से मोहनियां स्टेशन (भभुआ रोड) (मुगलसराय-गया लाइन पर)  आ सकते हैं, वहाँ से मन्दिर तक के लिए वाहन हमेशा उपलब्ध होते हैं|


रोचक बात यह है कि मन्दिर की देख रेख सालों से एक मुस्लिम परिवार करता आया है जिसे जनता भी सहर्ष स्वीकार करती है|

30 comments:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

देवी के दर्शन करवाने का आभार
-अच्छी जानकारी

Hima Agarwal said...

अच्‍छी जानकारी दी आपने। तस्‍वीरें देखकर वहां पंहुचने को मन करता है।

Udan Tashtari said...

अच्छी जानकारी.

अशोक मधुप said...

बहुत अच्छी जानकारी। कभी मौका लगा तो दर्शन जरूर करेंगे।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

देव दर्शन और जानकारी का धन्यवाद

"अर्श" said...

durlabh jaankari ......

rewa said...

apne jagah ki devi se ham khud a prichit the abtak. Achha kiya yahan dalkar, shukriya ise padhane ke liye.

विवेक सिंह said...

अच्‍छी जानकारी दी आपने। thanks

varsha said...

जानकारी के लिए शुक्रिया, उत्सुकता बढ़ गई है जब कभी बिहार जायेंगे इस मन्दिर के दर्शन अवश्य करेंगे

राज भाटिय़ा said...

बहुत अच्छी जानकारी, लेकिन एक बात समझ मै नही आई सन १९०० से या १९०० साल से यहां पुजा नही हो रही, ओर यह भी जरुर बताये अगर आप को पता हो कि पुजा क्यो न्ही हो रही??

दिलीप कवठेकर said...

रोचक जानकारी!!

संगीता पुरी said...

अच्‍छी जानकारी दी...साथ ही देवी का दर्शन भी करवाया...धन्‍यवाद।

seema gupta said...

"माँ मुंडेश्वरी मन्दिर के देवी दर्शन और जानकारी का धन्यवाद"

Regards

शाश्‍वत शेखर said...

भाटिया जी पूजा तो हो ही रही है, पिछले १९०० सालों से|

रंजना [रंजू भाटिया] said...

अच्‍छी जानकारी...

ARVI'nd said...

बहुत अच्छी जानकारी है शाश्‍वत जी, हिन्दुस्तान me ऐसी बहुत ही धरोहर है जिसे हम सहेज नही पा रहे है.

विनीता यशस्वी said...

Bahut achhi jankari

RAJIV MAHESHWARI said...

सुंदर चित्रों के साथ सुंदर जानकारी ..

धन्यबाद

Amit said...

देवी के दर्शन करवाने का आभार
-अच्छी जानकारी

bhai jaan itni acchi jaankaari kahan se laate hain?

शाश्‍वत शेखर said...

भाई मैं तो भभुआ का ही हूँ, बचपन से ही दर्शन करता आया हूँ :)

BrijmohanShrivastava said...

जानकारी के लिए बधाई स्वीकारें

PN Subramanian said...

ऐसे अंजाने मंदिरों की जानकारी देकर आपने हमें उपकृत किया. आभार. लेकिन आपके द्वारा बताई गयी तिथियाँ विश्वसनीय नहीं लगती.. वहाँ प्राप्त शिलालेख से केवल यही प्रमाणित हो रहा है की ६३० में वह स्ट्रक्चर विद्यमान रहा. हमारी सलाह है की मंदिर निर्माण कला के इतिहास का थोड़ा अध्ययन कर लें.आपको निश्चित ही लाभ होगा. यह मंदिर परिष्कृत (डेवेलप्ड) है. प्राचीनतम जो है वह लगभग ३ री सदी का ही है जो चौकोर है. मुदेश्वरी के इस मंदिर पर शोध करने की आवश्यकता है.कृपया अन्यथा ना लें.प्रथम दृष्टया हमें तो यह भवन किसी बौद्ध स्तूप के सदृश लग रहा है जिसे मंदिर का रूप दे दिया गया हो. यदि द्वार पर गंगा यमुना की मूर्तियों को स्थापित किया गया हो तो यह एक शिव मंदिर भी हो सकता है.

PN Subramanian said...

"Though a nationally protected monument of the ASI since 1915, a major portion of this 7th century stone structure stands damaged with fragments strewn all around, uncared and without any record. Documentation of those pieces too would begin shortly."
यह बिहार के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है जहाँ पूजा अर्चना लंबे समय से चली आ रही है.

शाश्‍वत शेखर said...

मन्दिर कब बना इसपर अभी एकमत नहीं है| यह कोई नई बात नही है, कितने ही ऐतिहासिक धरोहरों की स्थापना पर आज तक संदेह है| इसी मन्दिर को कोई ईसा पूर्व का कहता है, कोई 108 AD कोई 300 कहता है| 108 पर जादातर विद्वान् सहमत हैं| रही बात प्राचीनता की तो ASI ने इसे स्वीकार कर लिया है| कागजी कार्य चल रहे हैं, जल्दी ही हमारे सामने प्रमाण आ जायेंगे|

रही बात बौध स्तूप की तो बुद्ध से सम्बंधित कोई भी प्रमाण यहाँ नही मिलता, हिंदू धर्म से सम्बंधित मूर्तियाँ ही मिली हैं| आसपास के इलाकों में जरूर सिक्के इत्यादि मिले हैं| मन्दिर अस्टकोण में हैं, चौकोर नही| मन्दिर का मूल रूप वही है, मन्दिर का गुम्बज टूट चुका है, अंग्रेजों ने इसे इसके जगह छत बनवाया था| शायद इसीलिए आप इसे परिष्कृत कह रहे हैं|

यहाँ की देवी और चतुर्भुज शिवलिंग को देखकर धार्मिक इतिहासकार भी कहते हैं की ऐसा मन्दिर कहीं और देखा नही गया|

आपने जो कहा है "यह बिहार के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है जहाँ पूजा अर्चना लंबे समय से चली आ रही है" यह पुरानी बात है, ऊपर लिखे सभी तथ्य, शोध कार्य २००७-०८ के हैं| आप १० साल पहले की बात करें तो इस मन्दिर को सिर्फ़ आसपास के जिले के लोग ही जानते थे|

इस शोध कार्य में देश व विदेश के सर्वश्रेस्थ इस्तिहास्कार, विशेषज्ञ जुड़े हैं| इनके नाम मैं जल्दी ही आपको बताऊंगा|

शाश्‍वत शेखर said...

मन्दिर के अलावा भी कैमूर की पहाडियों में कई अन्य भित्तिचित्र इत्यादि मिले हैं| इसकी जानकारी भी मैं शीघ्र उपलब्ध कराने की कोशिश करूँगा|

Manish Kumar said...

सासाराम में जब हम रहते थे तो भभुआ भी जाना होता था पर इस मंदिर की बात पता नहीं थी। इस विस्तृत विवरण के लिए आभार !

MUFLIS said...

इस क़दर उम्दा ब्यान किया है हर पहलु आपने
पढने वालों को यूँ लगता है
जैसे ख़ुद ही साख्शात दर्शन कर के आए हों .......
बधाई

---मुफलिस---

आकांक्षा~Akanksha said...

आपके ब्लॉग पर आकर सुखद अनुभूति हुयी.इस गणतंत्र दिवस पर यह हार्दिक शुभकामना और विश्वास कि आपकी सृजनधर्मिता यूँ ही नित आगे बढती रहे. इस पर्व पर "शब्द शिखर'' पर मेरे आलेख "लोक चेतना में स्वाधीनता की लय'' का अवलोकन करें और यदि पसंद आये तो दो शब्दों की अपेक्षा.....!!!

varsha said...

गणतंत्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं।

अल्पना वर्मा said...

der se pahunchi--magar itni achchee jaankari mili.
bahut hi sundar prastuti hai-is mandir ke baare mein itna kuchh pata chala--chitr bhi dekhey.aap ko bahut bahut dhnywaad-