पढ़ना जो चाहो तो है किताब जिंदगी,
है सवाल जिंदगी और जवाब जिंदगी|
गम भी साथ इसके चली आती है,
चांदनी को लिए माहताब जिंदगी|
इतने दिन मैं जिया क्या किया क्यूँ किया,
हर घड़ी मांगती है हिसाब जिंदगी|
जुस्तजू जिसकी थी वो हमें ना मिला,
जो मिला वो गया वाह वाह जिंदगी|
अब कहूँ ना कहूँ मानता मैं भी हूँ,
गर जियूं तो कहूँ लाजवाब जिंदगी|
कहता हूँ मैं 'जमाल' बात तुम मान लो,
आज तो ना कहो है ख़राब जिंदगी|
3 comments:
अब कहूँ ना कहूँ मानता मैं भी हूँ,
गर जियूं तो कहूँ लाजवाब जिंदगी|
bahut sanjojan hai
बढ़िया रचना है।बधाई।
aapke aane se aap tak aayi aur zindagi ki gahraaiyon me doob gai,bahut achha likhte hain........
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