बड़ा शहर है यहाँ लोग बड़े मिलते हैं
खुशी के साए में ग़म बेशुमार मिलते हैं
रौनक-ऐ-जिस्म यहाँ हर अदा पे भारी है
नाम ढोता हुआ हर आदमी भिखारी है
अपनी नजर से ये बार बार गिरते हैं
खुशी के साए में ग़म बेशुमार मिलते हैं
कल अपने आप को बाजार में बिकते देखा
झूठ के कपडों से अहसास लिपटते देखा
चाँद सिक्कों से ऐतबार भी पिघलते हैं
खुशी के साए में ग़म बेशुमार मिलते हैं
ये तंग गलियाँ कहाँ से रौशनी आए
था बहुत शौक जो रहने को दिल्ली आए
हर एक चेहरे में चेहरे हजार दिखते हैं
खुशी के साए में ग़म बेशुमार मिलते हैं
13 comments:
लाजवाब! शेष क्या है कहने को!
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तख़लीक़-ए-नज़र
http://vinayprajapati.wordpress.com/
लाजवाब! नव वर्ष की आप और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं !!!
bahut he mast raha...
many many wishes for new year.....
बहोत खूब साहब क्या बात कही है आपने वाह....ढेरो बधाई,...
अर्श
टाइटल बहुत ही अच्छा है और इस नज़्म का तो जवाब नही बहुत अच्छा लिखा है भाई....
अक्षय-मन
खूबसूरत नज्म है भाई...
नया साल शुभ हो...
aaj ke parivesh ke ehsaason ko bakhoobi likha hai, yahi hasra hai,
aur ........ bahut badhiyaa
खुशी के साये में गम बेशुमार मिलते हैं कितनी सही हकीकत है /गल्तीहमारी यही है कि गम से बच कर खु;;सही चाहते है /गम न आए इस हेतु चारों ओर एक दीबार बना लेते है और परिणामस्वरूप बेचारी खुशी भी बाहर रुक कर रह जाती है /यह भी बिल्कुल सही है कि एक चेहरे में कितने चेहरे छिपे होते है ,उनका इल्म हमें तब होता है जब हमें कटु अनुभव होते हैं /
ये तंग गलियाँ कहाँ से रौशनी आए
था बहुत शौक जो रहने को दिल्ली आए
हर एक चेहरे में चेहरे हजार दिखते हैं
खुशी के साए में ग़म बेशुमार मिलते हैं
Bahut khubsurat! Bilkul sahi or saaf shabdon mein logon ki asaliyat jahir kiya hai aapne.
rgds.
aapka blog padhke lagta hai ki aap peshe se shayar honge aur fursat mein CA!! bahut badhiya likhte hain..
रौनक-ऐ-जिस्म यहाँ हर अदा पे भारी है
नाम ढोता हुआ हर आदमी भिखारी है
bahut khoob.
ये तंग गलियाँ कहाँ से रौशनी आए
था बहुत शौक जो रहने को दिल्ली आए
Dil waali dehli ki asli sachayee, well said
delhi ko yun hi dilwalon ki nhi kaha jata.bahut achche.
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