
दर्द-ऐ-दिल रोज बढाती रही है शाम,
नई तड़प के साथ मिलाती रही है शाम ।
दो जहाँ के आंसूं आंखों में लिए हुए,
पास आके हर घड़ी मुस्कुराती रही है शाम ।
कुछ इस अदा से दूर जाते रहें हैं आप,
कुछ इस तरह से पास आती रही है शाम ।
समझो या न समझो लग्जिश ये जुबान की,
हर खूबी आपकी पर बताती रही है शाम ।
पहने हुए हैं आपके ख्यालों के पैराहन,
हर शाम आपसे ही मिलाती रही है शाम ।
ऐतराफ़-ऐ-मोहब्बत वो करें या न करें,
ऐतराफ़-ऐ-मोहब्बत वो करें या न करें,
ऐतमाद-ऐ-मोहब्बत दिलाती रही है शाम ।
खिलवत के अंधेरे हों या जलवत के उजाले,
खिलवत के अंधेरे हों या जलवत के उजाले,
आवाज बस आपकी ही सुनाती रही है शाम ।
उनको हुआ नहीं कभी हमपे ऐतबार,
उनको हुआ नहीं कभी हमपे ऐतबार,
ये यकीं हमको दिलाती रही है शाम ।
मिले जब कभी भी किसी हसीं से हम,
मिले जब कभी भी किसी हसीं से हम,
तस्वीर आपकी ही दिखाती रही है शाम ।
जिंदगी की आदत कुछ यूँ पड़ी 'शेखर',
जिंदगी की आदत कुछ यूँ पड़ी 'शेखर',
जीने के फलसफे सिखाती रही है शाम ।
1 comment:
her sham maykhane ko salam karta hu : jab talak na aate tera kalam yad karta hu ...........
besak bahut khub gazal.
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