
इस रात की गहराई सताती है तुम्हें भी?
ये चांदनी कुछ याद दिलाती है तुम्हें भी?
यूँ दिल का तड़पना ये बिना बात की उलझन,
कुछ कहने की हसरत और बस बोलता है मन।
तन्हाई में रहने की ये आदत जो मुझे है,
इस शौक की दस्तक रुलाती है तुम्हें भी?
रात की गलियों मैं उस चाँद को तकना,
जुबाँ की जुम्बिश और फिर आप ही सुनना।
दूर हूँ तुमसे पर करता हूँ जो बातें,
इन बातों की महक हँसाती है तुम्हें भी?
गैरों की कही बातें अब मैं नहीं सुनता,
अब तेरी सादगी ही दिखाती है रास्ता।
एक बेखुदी सी फैली दिखती है इस तरफ़,
कुछ ऐसी जरुरत नजर आती है तुम्हें भी?
तुम साथ हो मेरे तो सुबह शाम हैं मेरे,
तेरा दर्द है मेरा, हँसी ख्यालात हैं मेरे।
तुम्हें अपना बनाने की अब चाहत जो इधर है,
ये खामोश हकीकत आजमाती है तुम्हें भी?
1 comment:
बहुत बढ़िया!
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