कल जाने क्यूँ चाँद सारी रात इतराता रहा,
कल रात माहजबीं को मैं चाँद दिखलाता रहा|
हसरत-ऐ-दिल था की छू लूँ उनके नाजुक लब मगर,
देख उनकी सादगी मैं हाय शरमाता रहा|
रात सारी काट दी देखता रहा उन आंखों में,
और यार मेरा जाने क्या मुझको समझाता रहा|
जब तलक किस्मत में उन गेसुओं की छाँव थी,
होके बेखुद हर घड़ी हँसता रहा गाता रहा|
मेरी वो नादानियाँ और उनका कहना वाह-वाह,
कुछ इस तरह 'जमाल' मैं उनसे दूर जाता रहा|
13 comments:
रात सारी काट दी देखता रहा उन आंखों में,
और यार मेरा जाने क्या मुझको समझाता रहा|
bahot hi badhiya sher ban pada hai jamaal sahab... bahot khub likha hai aapne.... dhero badhai aapko...
arsh
बढ़िया !
घुघूती बासूती
क्या कल्पना की है जनाब मज़ा आगया /मैंने उसे चाँद दिखलाया इसलिए चाँद इतराया ,क्या बात है / दूसरे शेर लायक मेरी औकात नहीं है / उन आंखों में देखते हुए सारी रात काटना और चौथा शेर बहुत ही आनंद बिभोर कर देने वाला इतना सुंदर की छाव की कल्पना करके भी आदमी हस और गा सकता है /दूर जाने का सवब भी वैसे ठीक ही है
bahut accha kamal ka likha hai aur blog bhi bahut sundar hai......
shuru se aakhir tak mashaallah waah
chaandni me doobi rachna
रात सारी काट दी देखता रहा उन आंखों में,
और यार मेरा जाने क्या मुझको समझाता रहा|
ye panktiyan aapke prem ki gaharaai ko darshati hain
bahut sundar prastuti
जाने क्यूँ रात इतरा के चाँद शाश्वत ,
माहज़बीं ने देखा ,वो दिखाता रहा
एक तो नादानियां ,उसपे बेखुद भी था
यह तो तब था जब वो शर्माता रहा
सर आप मेरे ब्लॉग पर पधारे /साथ में तुम होती की अंतिम लाइन में मैंने अपना पति धर्म निवाहना चाहा था
kya baat hai mein to apka fan ho gaya
khoobsoorat likha hai.aapke blog ke naam se anayas khinchi chali aayi. ab aati rahungi...ummid hai aap likhte rahenge.
baho achha,bahot hi khoobsoorat kalpna!!
Simply Beautiful!
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