पहलू में जिंदगी को सोने नहीं देते|
एक और साल खिंच गई उम्र की कश्ती,
काँधे पे मौत को मगर रोने नहीं देते|
हाय उस नाजुक सी परी के वो अल्फाज,
हमें ही करीब हमसे होने नहीं देते|
जीते हैं इसलिए कि मौत आएगी एक दिन,
फुर्सत के ये लम्हे मगर जीने नहीं देते|
डूबे तो कई बार उस चश्म में मगर,
"शेखर" तेरे वजूद को खोने नहीं देते|
15 comments:
बहुत ख़ूब साहब!
---मेरा पृष्ठ
चाँद, बादल और शाम
aarzu to apni bhi hai ki zindagi ka jashn manaayen..magar ye Corporates ke ghaple hame sone nahi dete..
एक और साल खिंच गई उम्र की कश्ती,
काँधे पे मौत को मगर रोने नहीं देते|
bhot badhiya....!
bhot khoooob.....!!
is gazal ko gungunane ka dil karta hai,bahut khoob
एक और साल खिंच गई उम्र की कश्ती,
काँधे पे मौत को मगर रोने नहीं देते
ये शेर खास तौर पर पसंद आया
एक और साल खिंच गई उम्र की कश्ती,
काँधे पे मौत को मगर रोने नहीं देते|
एक बेहतरीन ग़ज़ल देने के लिए धन्यवाद .
आने को उनकी याद तो आती है अब हर पल ,
हम आंसुओं को आँखें भिगोने नहीं देते .
'डूबे तो कई बार उस चश्म में मगर,
"शेखर" तेरे वजूद को खोने नहीं देते|'
- एक बढिया रचना! साधुवाद.
शब्द नही मिल रहे मिलते ही तारीफ करूँगा तब तक वाह वाह वाह
जिन्दगी को पहलू में सोने नही देते तो क्यों न जिंदगी के पहलू में ही सोया जाए /कंधे पे मौत को वो क्या रोने देगा जो ख़ुद अपनी लाश कंधे पर उठाए चल रहा हो /हम ख़ुद अपने से व अपनों से दूर होते जा रहे है किसी के अल्फाज़ क्या करेंगे / मौत का एक दिन सुनिश्चित है ,नींद क्यों रात भर नही आती / किसी के चश्म ने डूबने से उसका बजूद क्या खोये जो समंदर पार कर के आया हो
जीते हैं इसलिए कि मौत आएगी एक दिन,
फुर्सत के ये लम्हे मगर जीने नहीं देते|
A beautiful poem with beautiful words. Thanks for sharing your poem.
rgds.
उम्दा लिखा है,
जीते हैं इसलिए कि मौत आएगी एक दिन,
फुर्सत के ये लम्हे मगर जीने नहीं देते|
mazaa aa gayaa...kavitao aur shayari se zara door tha kuch dino se...aaj yahaan padhke mazaa aa gayaa
जीते हैं इसलिए कि मौत आएगी एक दिन,
फुर्सत के ये लम्हे मगर जीने नहीं देते|
बहुत खूब...बधाई
डूब ही गया.....
सारे के सारे शेर बहुत उम्दा हैं.....
आप बहुत ही अच्छा लिखते हैं भाई...
अक्षय-मन
bahoot khoob .aakhiri do sher khas hain.
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