
(वो पुआल से ताकती दो आँखें....वो घुरघुराना...वो संभल संभल के चलना....वो गाड़ियों का शोर....वो बेबसी....वो घुटी चीख....)
वो दिन जब आँख भी थी बंद मगर
कूं कूं कर रूह में समाते थे
हजार चेहरे लगाये गली से जब गुजरता था
मुझको मुझमे पहचान लेते थे….क्यूट पिल्ले
वो दिन जब अपने बर्फ से दांतों से
मेरी चप्पल खरोचा करते थे
वो निशान आज भी वहीँ ठहरा
बस तुम नही रुके….क्यूट पिल्ले
कल फ़िर तनहाइयों का साथ रहा
कुछ उबलता खौलता सा मिला आंखों में
जैसे पहले तुम भौंक कर चौंकाते थे
कल फ़िर मैं चौंक पड़ा था….क्यूट पिल्ले
सूनी सड़कों पर बेचारगी का शोर मिला
कैसे इंसान भी रफ़्तार साथ रखता है
भद्दे टायर से दबके जब मैं तेज चीखा था
तुम याद बहुत थे आए….क्यूट पिल्ले
15 comments:
bahut sundar likha hai...
वक़्त पर क्या नहीं याद आता........बहुत अच्छी रचना
bhadde tayar se dabke jab main tez cheekha tha ,tum yaad aaye the bahut................bahut hi marmik lines hain,haqeeqat bayan karti hain.ek marmik rachna
अच्छी रचना है।
बहुत सुन्दर रचना है,
---मेरा पृष्ठ
चाँद, बादल और शाम
jaane kahaan se wo itni maasoomiyat lata hai..bas apne maalik ka hoke rah jata hai.. uski badmaashiyon mein jaane kab waqt gujarta hai..uski aankhon mein har marz ka marham nazar aata hai..
samaaj dwara upekshit is jeev par itni sundar kavita likhne par mere & 'Mullu' ki taraf se shukriya!!
यादें तो अमृत हैं जो हमेशा साथ रहती हैं और जिन्हें याद करते हैं वो भी साथ होते हैं........
दिखते हैं अपनी यादों में...
खामोशी को जुबां दी है....
यादों में हमेशा जिन्दा है आपका क्यूट पिल्ला
अक्षय-मन
क्या खूब कहा है............
दिल में यादों को समेटे अक्सर ऐसा ही होता है फ़िर चाहे कोई क्यूट पिल्ला हो या दिल का करीबी
आपकी रचनाधर्मिता का कायल हूँ. कभी हमारे सामूहिक प्रयास 'युवा' को भी देखें और अपनी प्रतिक्रिया देकर हमें प्रोत्साहित करें !!
badhiya likha hai aapne sahab...dhero badhai......
arsh
आपको लोहडी और मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ....
आप भारतीय हैं तो अपने ब्लॉग पर तिरंगा लगाना अवश्य पसंद करेगे, जाने कैसे?
तकनीक दृष्टा/Tech Prevue
Bahut badhiya...kash ye to kam se kam cute hi bana rahe.
bahut yarana lagata hai .good poem.
मानव जहाँ प्रकृति प्रेमी है वही पशु पक्षी का भी प्रेमी सदैब से रहा है और प्रेम भी ऐसा कि -कहा जाता है धर्मराज ने स्वर्ग भी अकेले जाने से इनकार कर दिया था /खैर /जहाँ तक रचना का प्रश्न है भावुक भी है और आत्मीयता से भरी हैं /पैदाइश से अंत तक का जो विवरण दिया है सराहनीय है / पैदा होने पर खुशी ,फिर बढ़ता प्रेम और अंत में दुःख -अपनी ये भावनाए वह जीव समझ पाया हो या नहीं लेकिन साहित्यकार को तो समझना ही होगा क्योंकि उनमें बुद्धि भी है और भावुकता भी
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