
कई महीनों बाद सतीश से बात हुई| जब मैं दिल्ली में था तो मोहल्ले की चाय दूकान पर हर शाम मिलते, दुनिया जहाँ की बातें करते| सतीश से मैंने सिंघासन के बारे में पुछा था-
"सिंघासन कैसा है?"
"सिंघासन, पता नही यार कई दिनों से देखा नही उसे|"
"अंकल से बात कराना|"
ठीक है कहकर सतीश ने फ़ोन रखा और शाम में चाय वाले अंकल से बात करायी| मैंने सिंघासन के बारे में पुछा|
"सिंघासन तो कई हफ्तों से काम पर नही आया| कुछ लोगों ने मिलकर उसे बहुत पीटा था|"
"पीटा था" सुनकर मैं सन्न रह गया| ५५ साल के बुजुर्ग को पीटा था, मगर किसलिए| कैसा है सिंघासन?
मैंने सतीश से गुजारिश की,
"कुछ भी करके मेरी सिंघासन से बात करा दो|"
उसने आश्वासन दिया|
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३ साल पहले की बात है| मैं एक मित्र को आनंद विहार बस अड्डे ग्वालियर की बस पर चढाने आया था| मित्र के पास एक भारी बक्सा था, जिसे बस पर चढाने के लिए एक बुजुर्ग सामने आया जो बमुश्किल यह काम कर सका| बस के जाने के बाद मैं उस बुजुर्ग से मिला|
"बाबा, ये काम क्यूँ करते हो? कुछ और काम क्यूँ नही देख लेते, इस उम्र में यह काम ठीक नही है|"
बुजुर्ग से बीस मिनट बात हुई| अपना नाम सिंघासन बताया| सासाराम, बिहार के किसी गाँव का था, लम्बी बीमारी के बाद बीवी चल बसी, बेटे ने फिरोजाबाद फैक्ट्री में नौकरी मिलने के बाद बाप को नही पुछा| गाँव में कुछ रोजगार न था, इसलिए दिल्ली आ गया|
"चाय बना लेते हो बाबा?"
"हँ बाउजी|"
"मेरे पहचान के एक चाय वाले हैं जिन्हें चाय बनाने, देने के लिए एक आदमी की तलाश है| रहने का इन्तजाम भी कर देंगे| जाओगे वहां?"
"काहे ना बाउजी, हमके त बस जिनगी बसर करे के बा|"
उसी शाम मैं सिंघासन को चाय वाले अंकल से मिलाने लाया| अगले दिन से सिंघासन काम पर लग गया|
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सुरेश अगले दिन सिंघासन से मिला|
"यार बहुत दुःख हो रहा है, बाबा चल भी नहीं पा रहे, तू ही बात कर|"
मेरी आवाज सुनकर बाबा रो पड़े|
"कैसन बानीं बाउजी?"
ज्यादा बोल नही पाये, सारा हाल सतीश ने सुनाया|
बाबा सारी जिंदगी बिहार में रहे| ख़ुद तो दिल्ली आए साथ में बिहारी बोली भी लाये| हर जगह मुस्कराहट बिखेरते| चाय पहुंचाने कई जगह जाते, उन्ही जगहों में एक दूकान भी थी, दूकान वाला इनकी बिहारी बोली सुनकर खार खाता था| एक दिन डंडे से इनकी खूब पिटाई की और पहली मंजिल से नीचे धक्का दे दिया|
आज तक बाबा की कही यह बात मेरे कानों में गूंजती रहती है,
"बाबू, हम त बिहारी हईं न"
26 comments:
कमीने किस रुप मे मिले यह किसी को नही मालुम,
बहुत दरदनाक कहानी सुनाई आप ने.
धन्यवाद
कमीने किस रुप मे मिले यह किसी को नही मालुम,
बहुत दरदनाक कहानी सुनाई आप ने.
धन्यवाद
bahut maarmik.....bhaatiya jee ne sahi kaha hai....
ठिक्कै कहलन बाबूजी ।
अ उर अपन भाखा कोनो भूलेला ?
हमरे 45 साल हो गेल बिहार से स्थायी सम्पर्क छोड़ले !
ये तो आपराधिक बात है आप किसी को किसी के भाषा के लिए क्षति नही पहुँचा सकते ये तो मौलिक अधिकार के ख़िलाफ़ है ...........आज के समय में लोग बिहारीओं से क्यूँ परेशान हैं ...जहाँ से सबसे ज्यादा प्रशासनिक अधिकारी और राज नेता पैदा लेते है ये लोग क्यूँ भूल जाते है..सिर्फ़ आपराधिक छवि के कारन तो आज आपराद बिहार से ज्यादा अन्य राज्यों में भी हो रहे है ...ये तो वही बात हो गई के करे कोई और भारे कोई ....
अर्श
बहुत ही मार्मिक एवं संवेदनपूर्ण, आपकी रचना यथार्थ को दर्शाती है!
Shekhar ji,
darasal hamaaraa samajik aparaadhikaraN ho rahaa hai. aur ham aadami hi nahi aadamiyat se nafarat karane lage hai.
bahut acchi aur dard bhari koi kahaani nahi asliyat hi ho sakati hai.
Mukesh Kumar Tiwari
Camp : Pune
हृदय विदारक !
पता नही कब लोग भाषा जाति धर्म से ऊपर उठकर देखेंगे..
लोगों की सोच और ऐसे लोगो की सोच जिनके लिए अपराध सुख के समान है, के बारे में क्या कहा जाए. आपकी लेखनी पढ़ के दुःख हुआ
:-(
राज भाटिया जी ने मेरे मन की बात दी...
insaan kab insaan banega nahin maloom.......
tukadon men bante hain yahan log ....
marmik!!
असल में बहुसंख्यक बिहारी समाज दूसरे प्रदेशों में गरीब है और गरीब को गरियाना सबसे आसान विकल्प है । एक दूसरा कारण यह भी है कि बिहारी दिल्ली या अन्य प्रदेशों में थोडा बाद में आए हैं और transition के एक phase से गुजर रहे हैं। जैसे ही समय के साथ बिहारियों में भी समद्वि आएगी लोगों को उन्हें देखने का नजरिया बदल जाएगा।
... प्रसंशनीय।
Satya ke bahut nikat hai ya katha.
shyam kori 'uday' said...
... प्रसंशनीय।"
kyaa bhai, kya prasanshaniya lagaa aapako? inaki prastuti ya bihaari par maar? kripya spashta karen..
मुंबई की दादागिरी से तो वाकिफ़ हैं लेकिन दिल्ली में ?! क्या वहाँ के लोग अपने बाप की भी पिटाई करते हैं? करते ही होंगे तभी ना.
bahut sundar uttam
मार्मिक घटना है...मगर सच अक्सर इस तरह कड़वा ही होता है. बिहारी होने के कारण अपमान कईयों ने झेला है...जिनके बस में होता है प्रतिकार करते हैं पर एक गरीब कर ही क्या सकता है. अपने देश में ये अत्यन्त दुखद परिस्थिति है
aapne aaeena dikhaker dukhi kar diya...
Nischay hi ghatna marmik hai. Par kya Bihar 1764 ke baad, varan ussey bhi purva se, aise utpiranon ka shikar nahin raha hai? Bihar mazdooron ke niryat ka factory ban gaya hai. Pahle, unnisveen satabdi mein Fiji, Mauritius, Surinam, West Indies mazdoor bheje jate they, aur ab Mumbai, Bangalore, Kashmir, North East aur desh ke anya sthano par. Kya Bihar sirg mazdoor hi banata rahega? Kya Aryabhatta, Chanakya, Ashok, Chandragupta, Nalanda adi Bihar ne banana band kar diya? Mool karno ki khoj awashyak hai, aur uspar karya bhi. Har Bihari jo smridhi ko prapta hua hai ki jimeewari hai. Apne sochne par awasya hi majboor kiya hai. Dhanyawaad.
Rajiv Singh, Patna, Srikrishnapuri
rrpsingh@gmail.com
This write up of urs reminded me of one of my college friends...he is alsof rom bihar n he met an old man on a railway station n brought him with him to our college (which is around 700kms from tht place)rquested our mess operator to give him a job and and gave him his clothes also....
Neelima
“ोखर!
यह कैसा नाव इस ठांव बांध दिया है?
यह नाव ही तो है। बेचारा बंधुआ।
निराला ने लिखा था-
बांधो न नाव इस ठांव बंधु
पूछेगा सारा गांव बंधु।
एक प्रश्न आपसेः
यह नाव भी क्या “ााश्वत रहेगा?
काफी दर्दनाक कथा। दिल अपनों के साथ आ गया।
Arey saahab,
Rongate khade karwa diye aapne!
:-(
padhkar aansu nahi tham pa rahe hain bhaiya
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