Saturday, 17 January 2009

क्या जानकर उन्हें बेवफा हम कहते हैं

Sad-Sam-2656


जुर्म होगा अब अगर मिलने जाए हम,


ख़ुद आयें तो उसे बेदिली वो कहते हैं।



कल तलक सूरत तुम्हारी थी हमारी जिंदगी,


आज भी ये हाल है कि मौत से हम डरते हैं।



धडकनों के रुकने से उस मौत के आने तक,


बीच के मंजर को जिंदगी हम कहते हैं।



दर्द कि पेशी हुई अब जिंदगी के सेज पर,


जाने कितने लोग हैं जो छुप छुपा कर सहते हैं।



वक्त बचता है कभी भी तुझको याद करने के बाद,


आंखों में नरमी लिए तेरा इन्तेजार हम करते हैं।



गिनतियाँ कितनी गिनीं थकती नहीं उँगलियाँ,


कितने दीवाने मेरी गली में मारे मारे फिरते हैं।



शक्ल उनकी देखकर ये ग़म सताता है बहुत,


जाने क्या जानकर उन्हें बेवफा हम कहते हैं।

Thursday, 15 January 2009

बाबू, हम त बिहारी हईं न


कई महीनों बाद सतीश से बात हुई| जब मैं दिल्ली में था तो मोहल्ले की चाय दूकान पर हर शाम मिलते, दुनिया जहाँ की बातें करते| सतीश से मैंने सिंघासन के बारे में पुछा था-
"सिंघासन कैसा है?"
"सिंघासन, पता नही यार कई दिनों से देखा नही उसे|" 
"अंकल से बात कराना|"
ठीक है कहकर सतीश ने फ़ोन रखा और शाम में चाय वाले अंकल से बात करायी| मैंने सिंघासन के बारे में पुछा|
"सिंघासन तो कई हफ्तों से काम पर नही आया| कुछ लोगों ने मिलकर उसे बहुत पीटा था|"

"पीटा था" सुनकर मैं सन्न रह गया| ५५ साल के बुजुर्ग को पीटा था, मगर किसलिए| कैसा है सिंघासन?
मैंने सतीश से गुजारिश की,
"कुछ भी करके मेरी सिंघासन से बात करा दो|"
उसने आश्वासन दिया|

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३ साल पहले की बात है| मैं एक मित्र को आनंद विहार बस अड्डे ग्वालियर की बस पर चढाने आया था| मित्र के पास एक भारी बक्सा था, जिसे बस पर चढाने के लिए एक बुजुर्ग सामने आया जो बमुश्किल यह काम कर सका| बस के जाने के बाद मैं उस बुजुर्ग से मिला|
"बाबा, ये काम क्यूँ करते हो? कुछ और काम क्यूँ नही देख लेते, इस उम्र में यह काम ठीक नही है|"

बुजुर्ग से बीस मिनट बात हुई| अपना नाम सिंघासन बताया| सासाराम, बिहार के किसी गाँव का था, लम्बी बीमारी के बाद बीवी चल बसी, बेटे ने फिरोजाबाद फैक्ट्री में नौकरी मिलने के बाद बाप को नही पुछा| गाँव में कुछ रोजगार न था, इसलिए दिल्ली आ गया|

"चाय बना लेते हो बाबा?"
"हँ बाउजी|"
"मेरे पहचान के एक चाय वाले हैं जिन्हें चाय बनाने, देने के लिए एक आदमी की तलाश है| रहने का इन्तजाम भी कर देंगे| जाओगे वहां?"
"काहे ना बाउजी, हमके त बस जिनगी बसर करे के बा|"

उसी शाम मैं सिंघासन को चाय वाले अंकल से मिलाने लाया| अगले दिन से सिंघासन काम पर लग गया|

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सुरेश अगले दिन सिंघासन से मिला|
"यार बहुत दुःख हो रहा है, बाबा चल भी नहीं पा रहे, तू ही बात कर|"

मेरी आवाज सुनकर बाबा रो पड़े|
"कैसन बानीं बाउजी?"
ज्यादा बोल नही पाये, सारा हाल सतीश ने सुनाया|

बाबा सारी जिंदगी बिहार में रहे| ख़ुद तो दिल्ली आए साथ में बिहारी बोली भी लाये| हर जगह मुस्कराहट बिखेरते| चाय पहुंचाने कई जगह जाते, उन्ही जगहों में एक दूकान भी थी, दूकान वाला इनकी बिहारी बोली सुनकर खार खाता था| एक दिन डंडे से इनकी खूब पिटाई की और पहली मंजिल से नीचे धक्का दे दिया|

आज तक बाबा की कही यह बात मेरे कानों में गूंजती रहती है,
"बाबू, हम त बिहारी हईं न"

Tuesday, 13 January 2009

तुम याद बहुत थे आए….क्यूट पिल्ले


(वो पुआल से ताकती दो आँखें....वो घुरघुराना...वो संभल संभल के चलना....वो गाड़ियों का शोर....वो बेबसी....वो घुटी चीख....)

 



वो दिन जब आँख भी थी बंद मगर


कूं कूं कर रूह में समाते थे


हजार चेहरे लगाये गली से जब गुजरता था


मुझको मुझमे पहचान लेते थे….क्यूट पिल्ले


 


वो दिन जब अपने बर्फ से दांतों से


मेरी चप्पल खरोचा करते थे


वो निशान आज भी वहीँ ठहरा


बस तुम नही रुके….क्यूट पिल्ले



 

कल फ़िर तनहाइयों का साथ रहा


कुछ उबलता खौलता सा मिला आंखों में


जैसे पहले तुम भौंक कर चौंकाते थे


कल फ़िर मैं चौंक पड़ा था….क्यूट पिल्ले


 


सूनी सड़कों पर बेचारगी का शोर मिला


कैसे इंसान भी रफ़्तार साथ रखता है


भद्दे टायर से दबके जब मैं तेज चीखा था


तुम याद बहुत थे आए….क्यूट पिल्ले

Sunday, 11 January 2009

बुधई और नीम का पेड़

रूह को छूने वाली यह ग़जल सुनें, जगजीत सिंह की आवाज में यह ग़जल "नीम का पेड़" धारावाहिक में आपने जरूर सुना होगा|

Thursday, 8 January 2009

हाय उस नाजुक सी परी के वो अल्फाज

दर्द बेपरवाह कभी होने नहीं देते, 
पहलू में जिंदगी को सोने नहीं देते|  

एक और साल खिंच गई उम्र की कश्ती, 
काँधे पे मौत को मगर रोने नहीं देते|  

हाय उस नाजुक सी परी के वो अल्फाज, 
हमें ही करीब हमसे होने नहीं देते|

जीते हैं इसलिए कि मौत आएगी एक दिन, 
फुर्सत के ये लम्हे मगर जीने नहीं देते|  

डूबे तो कई बार उस चश्म में मगर, 
"शेखर" तेरे वजूद को खोने नहीं देते|